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Barish Hindi Story , “Barish Ki Bundein”

Barish ki bundein hindi story

Barish Hindi Story

A beautiful hindi story By Bhaumik Trivedi

घड़ी की सूई अभी 5:55 पे थी कि में अपनी मेज़ पे बिखरी फाईल्स समेत कर घर जाने के लिए या यूह कहो दफ़्तर से भाग ने के लिए तैयार हुआ। पास पड़ी तिजौरी पे लगे आयने में देख ज़रा बाल ठीक किये फिर अपनी बैग थामे सीडिया उत्तर गया दफ़्तर की। बाहर आते ही देखता हूँ तो आसमान पे बादल, थोड़ी हैरानी हुई क्योंकि अभी बारिश के मौसम में कुछ वक़त था। मेरे साथ ही दफ़्तर से निकले अमित को कल मिलते है कहकर में फिर झटपट चल दिया घर की और।

 

             मेरे घर से दफ़्तर की दूरी थी तक़रीबन 25-26 मिनट का पैदल सफर। सेहद के ख़याल के बहाने में दिन के 40 या यूह कहो महीने के 1140 रुपये बचा लेता था जो कि मेरे लिए तनख़्वाह के 10 % थे। बदले हुए इस मौसम का लुत्फ़ उठाते हुए अपनी धुन में चलता में आधा सफर काट चुका था। अब मिट्टि की महक आने लगी थी, और इससे पहले की बारिश तेज़ हो जाये मेने बैग में से वो प्लास्टिक बैग निकाली जिसमे टिफ़िन बॉक्स रखा हुआ था और अपना बटवा और मोबाइल उसमे ठीक से रख दिए। अब में भीगने के लिए तैयार था, मुझे बचपन से ही भीगना अच्छा लगता था, और मुझे इंतेज़ार भी नहीं करना पड़ा। सामने की और से आती तेज़ ठंडी हवाएं बर्फ़ सी मोती-आकर बूंदों को मेरे चेहरेपर पटक रही थी।

            उस पहली बरसात की बूंदों ने मेरी दिनभर की थकावट तो जैसे पलभर में उतार दिया। मेरा मन अब ख़ुशमिजाज़ हो चुका था और में मस्त होकर फ़िल्मी गाने गुनगुनाने लगा और फिर जब दोस्तो के साथ ऐसे मौसम में बाइक पर शहर गुमा करते थे, किताबें ही नही छातो की लेन देंन भी जब बात करने या ख़ुशनसीब मामलों में मुलाक़ात का बहाना हुआ करती थी उन कॉलेज के दिनों की याद में भी कुछ देर तक खोया रहा।

 

            फिर युही अपनी धुन में अपने ख़यालो में चलता, भीगता में घर आ पहुँचा। घर देखते ही ख़यालो के बादल छत गए पर ख़ुशमिजाज़ी अभी वैसे की वैसी थीं। दरवाजे से ही मेने आवाज़ लगाई “अम्मी टॉवल देना”, रसोईघर से अम्मी कुछ बड़बड़ाते हुए आयी और टॉवल थमा कर चली गयी। मेने सर और चेहरा पोंछा, गीले शूज़ बाहर रखकर घर मे दाखिल हुआ और बेग एक कोने में रख दी। अब बारी थी अपने गीले कपड़े बदलने की, मेंने अपने एक मंज़िला घर की आखरी मंज़िल पे आये मेरे कमरे के लिए सीडियां पकड़ी।

              ऊपर आकर दो कदम ही चला था कि फ़र्श पे गिरे पानी से में फिसलते फिसलते बचा, अभी संभला ही था कि सूख चुके मेरे सर पे बूंदे आ गिरी, वो ही बर्फ़ सी ठंडी मोती-आकार बूंदे, जिसपे थोड़ी देर पहले मुझे बहोत प्यार आ रहा था, हाँ मगर अब की बारी बात कुछ और थी अब के न कोई गीत गुनगुनाने का मनकर रहा था ना ही अतीत की कोई मीठी याद ज़हन में आ रही थी, सामने थी तो बस टपक रही वो छत जिसकी मरम्मत पिछले 6 साल से 50 मिनट रोज़ चलकर, महीने के 26 दिन काम करके भी मुझसे न हो पाई थी। फिर नज़र फ़ेर के वहाँ से अपने कमरे की और बढ़ गया, गीले कपड़े बदले। फिर वही बिस्तर की बगल में पड़े आयने के सामने बाल ठीक करने लगा। बाल ठीक करते हुए मैने पाया कि चेहरा फिर से दफ़तर से निकलते वक्त था वैसा हो गया है और मेने मन ही मन मे कहा देखो,


“शहर में हुई बारिश की ख़ुशियाँ, घर की बूंदे बहा ले गई”

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जिसे यूँ देखकर तू दर्द में इतना परेशाँ है
बहुत ख़ुश भी उसे गर देखता देखा न जाता दिल

वफ़ा कम क्या हुई बस तर्के ताल्लुक कर लिया खुद ही
इन आँखों से कभी वो बेवफ़ा देखा न जाता दिल

बहाना क्या मिला बस
ज़रा शक क्या हुआ बस

बहुत दिन बाद देखा तो हुआ भी देख लू कुछ और
मगर फिर वो

ज़माने बाद देखा सो हुआ भी और देखू कुछ

किसी जन्नत से कम तर तो नहीं उसकी गली
फिरा आता मगर वो देवता देखा न जाता दिल

नहीं है स्वर्ग से कम तर महल
टिकाए बैठना रुखसार अब भी यूँ हथेली पर
टिकाये गाल उसने जिस हथेली पर रख आता
मगर फिर वो तिरे से खेलता देखा न जाता दिल

थे रक्खे गाल उसने जिस हथेली में दबा आता
मगर फिर वो तिरे से खेलता देखा न जाता दिल

जिसे देखकर दर्द में दर्द में हूँ
उसे देखकर ख़ुश बहुत दर्द होता

जिसे देखकर दर्द में, कुछ उदास हूँ
उसे ख़ुश अगर देखता दर्द होता


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